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राजनीति में वंशवाद में उत्तर भारत में यूपी के बाद राजस्थान दूसरे नंबर पर है। यहां 5 में से 1 विधायक-सांसद राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखता है। सिर्फ पुरुषों की बात करें तो 15% सांसद-विधायक राजनीतिक परिवार से हैं। वहीं हर दूसरी महिला विधायक-सांसद राजनी
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चुनाव सुधार संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में ये तथ्य राजस्थान से विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के 234 सदस्यों के अध्ययन में सामने आया है। इनमें से 43 वंशवादी हैं, जो 18 फीसदी हैं। रिपोर्ट के अनुसार पहला नंबर यूपी का है। वहां 141 वंशवादी हैं, जो 23 प्रतिशत हैं।
पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
210 पुरुष जनप्रतिनिधियों में से 31 और 24 महिलाओं में से 12 राजनीतिक परिवारों से रिपोर्ट में रोचक तथ्य सामने आया है कि प्रदेश में 210 पुरुष विधायक-सांसदों में 31 राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं, जो 15 फीसदी है। हालांकि इस मामले में राजस्थान से आगे भी कई राज्य हैं। जैसे, जम्मू-कश्मीर में 33, आंध्र प्रदेश में 29, महाराष्ट्र व कर्नाटक में 28, हरियाणा में 27, बिहार में 22, उत्तर प्रदेश व तेलंगाना में 21, पंजाब व हिमाचल प्रदेश में 19, झारखंड व ओडिशा में 17, मध्य प्रदेश में 16 और तमिलनाडु में राजस्थान के बराबर 15 फीसदी है।
महिला जनप्रतिनिधियों में 50 फीसदी परिवारवाद महिला विधायक-सांसदों में परिवारवाद का प्रतिशत 50 फीसदी है। राजस्थान में 24 में से 12 महिला नेता राजनीतिक परिवार से हैं। हालांकि कई राज्यों में राजनीतिक परिवारों से आने वाली महिला नेताओं का प्रतिशत 50 से भी अधिक है। जैसे, गोवा में 100, मेघालय व अरुणाचल प्रदेश में 75, झारखंड में 73, महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश में 69, जम्मू-कश्मीर में 67, उत्तराखंड व तेलंगाना में 64, हरियाणा में 60, बिहार में 57, कर्नाटक व मध्य प्रदेश में 53, केरल व असम में राजस्थान के बराबर 50-50 फीसदी महिलाएं राजनीतिक परिवार से आती हैं।

राजस्थान में लोकसभा में टॉप 3 राजनीतिक परिवार से
- झालावाड़-बारां सांसद दुष्यंत सिंह : नानी (विजयाराजे सिंधिया) बीजेपी को-फाउंडर व 8 बार MP, मां (वसुंधरा राजे) 2 बार CM व 2 बार केंद्रीय मंत्री रहीं, 6 बार MLA, 5 बार MP रहीं।
- झुंझुनूं सांसद बृजेंद्र सिंह ओला : पिता (शीशराम ओला) 5 बार MP व 8 बार MLA, राज्य व केंद्र में मंत्री रहे।
- चूरू सांसद राहुल कस्वां : दादा (दीपचंद) MLA, पिता (राम सिंह) MLA व 4 बार MP, मां भी MLA रहीं।

राजस्थान से राज्य सभा में टॉप 3 राजनीतिक परिवार से
- सोनिया गांधी : ससुर (जवाहर लाल नेहरू) देश के पहले प्रधानमंत्री, पति (राजीव गांधी) और व सास (इंदिरा गांधी) भी PM रहे।
- मुकुल वासनिक : पिता (बालकृष्ण) लोकसभा डिप्टी स्पीकर, 1957 से 1977 तक लोकसभा MP और 1992 से 1998 तक राज्यसभा MP रहे।
- रणदीप सुरजेवाला : पिता (शमशेर) 4 बार MLA और 1992 से 1998 तक राज्यसभा MP रहे

राजस्थान की टॉप 7 महिला विधायक राजनीतिक परिवार से
- वसुंधरा राजे : मां विजयाराजे सिंधिया बीजेपी को-फाउंडर व 8 बार MP
- डॉ. प्रियंका चौधरी : दादा गंगाराम चौधरी केबिनेट मंत्री व 8 बार MLA रहे
- रीटा चौधरी : पिता राम नारायण चौधरी 6 बार MLA रहे
- सिद्धि कुमारी : दादा करणी सिंह 5 बार MP
- कल्पना देवी : पिता बृजराज सिंह 3 बार MP व पति इज्येराज सिंह MP
- दीप्ति महेश्वरी : मां किरण महेश्वरी केबिनेट मंत्री, 3 बार MLA व MP रहीं
- शांता मीणा : पति अमृतलाल मीणा 3 बार MLA

राजस्थान विधानसभा में प्रमुख MLA राजनीतिक परिवार से
- टोंक विधायक सचिन पायलट : पिता राजेश पायलट केंद्रीय मंत्री व MP, मां रमा पायलट MLA रहीं
- नागौर विधायक हरेंद्र मिर्धा : दादा बलदेव राम मिर्धा पिता राम केंद्रीय मंत्री और पिता राम निवास मिर्धा विधानसभा अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री रहे
- नदबई विधायक जगत सिंह : पिता नटवर सिंह केंद्रीय मंत्री रहे
- श्रीमाधोपुर विधायक झाबर सिंह खर्रा : पिता हरिलाल मंत्री व 5 बार MLA रहे
- राजाखेड़ा विधायक रोहित बोहरा : पिता प्रद्युम्न सिंह केबिनेट मंत्री, 7 बार MLA
- सरदार शहर विधायक अनिल कुमार शर्मा : पिता भंवरलाल शर्मा 7 बार MLA
- सुजानगढ़ विधायक मनोज कुमार : पिता मास्टर भंवरलाल मेघवाल केबिनेट मंत्री व 4 बार MLA
- दांतारामगढ़ विधायक वीरेंद्र सिंह : पिता नारायण सिंह मंत्री व 7 बार MLA
- सादुलशहर विधायक गुरवीर सिंह : दादा गुरजंट सिंह मंत्री और 4 बार MLA
- पचपदरा विधायक अरुण चौधरी : पिता अमराराम चौधरी मंत्री व 5 बार MLA
- श्रीकरणपुर विधायक रुपिंदर सिंह कुन्नर : पिता गुरुमीत सिंह कुन्नर 4 बार MLA
- नसीराबाद विधायक रामस्वरूप लांबा : पिता सांवरलाल जाट मंत्री रहे
- डीग-कुम्हेर विधायक डॉ. शैलेष सिंह : पिता डॉ. दिगम्बर सिंह मंत्री रहे

नाम, प्रभाव, पैसा और नेटवर्क का इस्तेमाल, योग्यता आधार नहीं
रिपोर्ट में कहा है कि वंशवाद की राजनीति में ऐसे परिवार हैं, जिनके नाम, प्रभाव, पैसे और नेटवर्क का इस्तेमाल नई पीढ़ी करती आई हैं। इससे योग्यता, मेहनत, जवाबदेही और समान प्रतिनिधित्व की राजनीति पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
रिपोर्ट में माना गया है कि किसी भी पार्टी में टिकट वितरण को लेकर कोई मापदंड या योग्यता आधार नहीं है। यही वजह है कि वंशवाद की राजनीति को बढ़ावा मिलता है। बार-बार टिकटें राजनीतिक परिवारों को मिलती हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिक मान्यताओं की कमी है।
आखिर क्यों पनप रहा वंशवाद रिपोर्ट के अनुसार चुनाव में ‘धन व बाहुबल’ और जीतने की क्षमता के कारण भी वंशवाद पनपता है। राजनीतिक पार्टियों की संरचना भी एक कारण है। पार्टी में सबसे शक्तिशाली पद पर रहने वाला तय करता है कि किसे टिकट देनी है और कौन आगे पार्टी संभालेगा।
राजनीतिक पार्टियों के सूचना के अधिकार (RTI) के अंतर्गत नहीं आने से भी सार्वजनिक जवाबदेही का अभाव रहता है। इसलिए वंशवादी सोच और ज्यादा पनप जाती है।

छोटे दलों में चलन ज्यादा रिपोर्ट में माना गया है कि वंशवादी राजनीतिक के प्रचलित होने का श्रेय देश की मजबूत पारिवारिक परंपराएं भी हैं। ये परंपराएं मतदाता की नजर में वंशवाद को उचित ठहराती हैं। भारत में इसे सामान्य और स्वीकार्य माना जाता रहा है कि पिता या माता अपनी किसी भी प्रकार की शक्ति को अपने पुत्र या पुत्री को सौंपना चाहते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय और राज्यों की राजनीति को देखें, तो वंशवाद की राजनीति के संकेत 1970 के दशक में मिल गए थे। रिपोर्ट में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्र हो या राज्य हों, सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीतिक दलों, छोटे-बड़े सभी राज्यों, पुरुष-महिलाओं सभी क्षेत्र-वर्ग में वंशवाद समान रूप से दिखाई देता है। वहीं, छोटे दलों में यह काफी दिखाई देता है। रिपोर्ट में माना है कि महिलाओं में और छोटे दलों में ये ऊंचे स्तर पर हैं।
रिपोर्ट में कहा है कि वंशवादी राजनीतिक केवल विरासत बनाए रखने का माध्यम नहीं बल्कि राजनीतिक प्रवेश और अस्तित्व बनाए रखने का भी एक तरीका है। ये पारिवारिक सत्ता की निरंतरता के साथ राजनीतिक पहुंच का भी मामला है।
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