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दिसपुर4 मिनट पहले
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असम कैबिनेट की बैठक के बाद गुरुवार को सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने आधार कार्ड के फैसले की जानकारी दी।
असम में 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों का नया आधार कार्ड नहीं बनेगा। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने गुरुवार को कहा- असम कैबिनेट ने अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता से रोकने के लिए यह फैसला लिया है।
सीएम हिमंत ने कहा, राज्य के 18 साल से अधिक उम्र के जिन लोगों के पास अभी तक आधार कार्ड नहीं है, उन्हें आवेदन के लिए सिर्फ एक महीने का समय दिया जाएगा। वहीं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और चाय जनजाति के लोगों का एक साल तक आधार कार्ड बन पाएगा।


मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की अध्यक्षता में गुरुवार को असम कैबिनेट की बैठक हुई।
अक्टूबर 2024: असम में अप्रवासियों को नागरिकता देने वाला कानून वैध
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर में सिटिजनशिप एक्ट की धारा 6A की वैधता को बरकरार रखा था। CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच ने इस पर फैसला सुनाया था। फैसले पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सहित चार जजों ने सहमति जताई है। वहीं जस्टिस जेबी पारदीवाला ने असहमति जताई।
दरअसल, सिटिजनशिप एक्ट की धारा 6A को 1985 में असम समझौते के दौरान जोड़ा गया था। इस कानून के तहत जो बांग्लादेशी अप्रवासी 1 जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 तक असम आए हैं वो भारतीय नागरिक के तौर पर खुद को रजिस्टर करा सकते हैं। हालांकि 25 मार्च 1971 के बाद असम आने वाले विदेशी भारतीय नागरिकता के लायक नहीं हैं। पूरी खबर पढ़ें…

SC ने 7 दिसंबर 2023 को केंद्र से असम में बांग्लादेशी शरणार्थियों को दी गई नागरिकता का डेटा मांगा था।
क्या कहती है सिटिजनशिप एक्ट की धारा 6A

सिटीजनशिप एक्ट 1955 की धारा 6A, भारतीय मूल के विदेशी प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की अनुमति देती है। जो 1 जनवरी, 1966 के बाद लेकिन 25 मार्च, 1971 से पहले असम आए थे। यह प्रावधान 1985 में असम समझौते के बाद डाला गया था, जो भारत सरकार और असम आंदोलन के नेताओं के बीच हुआ समझौता था।
ये नेता बांग्लादेश से असम में प्रवेश करने वाले अवैध प्रवासियों को हटाने का विरोध कर रहे थे। जब बांग्लादेश मुक्ति युद्ध समाप्त हुआ था।असम के कुछ स्वदेशी समूहों ने इस प्रावधान को चुनौती दी, उनका तर्क था कि यह बांग्लादेश से विदेशी प्रवासियों की अवैध घुसपैठ को वैध बनाता है।
2012 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, 12 साल बाद फैसला

2012 में गुवाहाटी के नागरिक समाज संगठन, असम संयुक्त महासंघ ने धारा 6ए को चुनौती दी थी, जिसमें कहा था- धारा 6ए भेदभावपूर्ण, मनमानी और अवैध है, क्योंकि इसमें असम और शेष भारत में प्रवेश करने वाले अवैध प्रवासियों को नियमित करने के लिए अलग-अलग कट-ऑफ तिथियां प्रदान की गई हैं।
जब 2014 में मामले की सुनवाई हुई तो जस्टिस रोहिंटन नरीमन की अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ ने मामले को संविधान पीठ को भेज दिया, जिसका गठन 19 अप्रैल, 2017 को हुआ। इस पैनल में जस्टिस मदन बी. लोकुर, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस प्रफुल्ल चंद्र पंत, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे।
चूंकि, जस्टिस चंद्रचूड़ को छोड़कर सभी जज रिटायर हो चुके हैं, इसलिए चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एम.आर. शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की नई पीठ ने धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं दायर कीं।
जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी के रिटायर होने के कारण दोबारा बेंच बनाई गई, जिसमें सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के साथ जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे। मामले की सुनवाई 5 दिसंबर को शुरू हुई और 12 दिसंबर, 2023 को समाप्त हुई। कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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