नई दिल्ली58 मिनट पहले
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नेपाल में Gen Z आंदोलन के दैरान भारी हिंसा
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रपति और राज्पाल की विधेयकों को मंजूरी देने की समय सीमा से जुड़े मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि हमें भारत के संविधान पर गर्व है। नेपाल और बांग्लादेश के हालिया राजनीतिक उथल-पुथल का जिक्र करते हुए अदालत ने ये टिप्पणी की।
सीजेआई बीआर गवई ने कहा-पड़ोसी देशों में हो रही अस्थिरता भारत के मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे की ताकत को रेखांकित करती है।

यह बयान उस समय आया जब अदालत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और राज्यपालों द्वारा राज्यों के विधेयकों को मंजूरी देने के लिए तय समय सीमा पर चर्चा कर रही थी।
नेपाल में जारी हिंसक प्रदर्शन में अबतक हो चुकी है 22 लोगों की मौत

नेपाल में हिंसक प्रदर्शनों से हालात बिगड़ गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने संसद, पीएम, राष्ट्रपति के निजी आवास में आग लगा दी और सुरक्षा बलों से उनके हथियार छीन लिए। उन्होंने 3 पूर्व पीएम के घर पर हमला भी किया।
पूर्व पीएम झालानाथ खनाल के घर में आग लगा दी। इसमें उनकी पत्नी राजलक्ष्मी चित्रकार गंभीर रूप से जल गईं। उन्हें तुरंत कीर्तिपुर बर्न अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई।
उधर, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को उनके घर में घुसकर पीटा, जबकि वित्त मंत्री विष्णु पौडेल को काठमांडू में उनके घर के पास दौड़ा-दौड़ाकर मारा गया। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में एक प्रदर्शनकारी उनके सीने पर लात मारते हुए दिख रहा है।
देश में जारी हिंसक हिंसक घटनाओं के बीच प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने पद से इस्तीफा दे दिया। सेना का एक हेलिकॉप्टर उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गया।
राजधानी काठमांडू और आसपास के इलाकों में झड़पों और आगजनी में अब तक 22 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि 400 से ज्यादा लोग घायल हैं। पढ़ें पूर खबर…
2 सितंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट बोला- राष्ट्रपति के मामले में संविधान की व्याख्या करेंगे
सुप्रीम कोर्ट ने 2 सिंतबर को कहा था कि वह संविधान की व्याख्या सिर्फ राष्ट्रपति के मामले में करेगा, किसी राज्य या व्यक्ति से जुड़े अलग-अलग मामलों में नहीं। कोर्ट ने यह टिप्पणी राज्य सरकार द्वारा भेजे बिलों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति के साइन करने के लिए डेडलाइन लागू करने वाले मामले में की थी।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना या कर्नाटक जैसे राज्यों का उदाहरण देंगे, तो केंद्र को भी जवाब दाखिल करना होगा। इस पर CJI बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने कहा-
हम अलग-अलग राज्यों के मामलों पर चर्चा नहीं करेंगे, बल्कि केवल संविधान की धाराओं को देखेंगे।

सुनवाई में सिंघवी ने कहा कि अगर विधानसभा किसी बिल को वापस नहीं भेजना चाहती तो वह अपने आप अस्वीकृत हो सकता है। अगर राज्यपाल बिल को विधानसभा को लौटाते ही नहीं हैं, तो अनुच्छेद 200 की प्रक्रिया ही रुक जाएगी।
दरअसल, मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या अदालत राज्यपालों और राष्ट्रपति को बिलों पर फैसला करने के लिए समय-सीमा तय कर सकती है।

CJI ने पूछा- राज्यपाल ने बिल रोका तो क्या होगा?
CJI ने सिंघवी से पूछा कि अगर राज्यपाल बिल को रोक कर रखें और वापस विधानसभा को न भेजें तो क्या होगा?
इस पर सिंघवी ने कहा कि ऐसी स्थिति में बिल आगे नहीं बढ़ पाता और पहले के फैसलों के अनुसार वह ‘फॉल थ्रू’ मान लिया जाता है, जब तक कि अनुच्छेद 200 की पहली शर्त पूरी न हो।
अनुच्छेद 200 राज्यपाल को बिल रोकने का अधिकार देता है
अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि विधानसभा से पास बिल पर वह या तो मंजूरी दें, मंजूरी रोक लें, पुनर्विचार के लिए वापस भेजें या राष्ट्रपति के पास आरक्षित करें।
पहली शर्त यह है कि अगर विधानसभा दोबारा विचार के बाद विधेयक वापस भेज दे, तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देनी ही होगी।
केंद्र ने कहा था- राज्य सरकारें मामले में SC नहीं जा सकतीं
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि अगर राज्यपाल अनिश्चित समय तक बिल रोक कर रखते हैं, तो ‘जल्दी’ शब्द का महत्व खत्म हो जाएगा। हालांकि, केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि राज्य सरकारें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकतीं, क्योंकि राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते।

तमिलनाडु से शुरू हुआ था विवाद…
यह मामला तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच हुए विवाद से उठा था। जहां गवर्नर से राज्य सरकार के बिल रोककर रखे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को आदेश दिया कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है।
इसी फैसले में कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सामने आया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने मामले में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और 14 सवाल पूछे थे। पूरी खबर पढ़ें…
पिछली 5 सुनवाई में क्या हुआ…
28 अगस्त: केंद्र बोला- राज्य सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन नहीं दे सकते
केंद्र सरकार ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल की विधानसभा से पास बिलों पर कार्रवाई के खिलाफ राज्य सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन दायर नहीं कर सकते। केंद्र ने कहा कि राज्य सरकारें अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। क्योंकि मौलिक अधिकार आम नागरिकों के लिए होते हैं, राज्यों के लिए नहीं। पूरी खबर पढ़ें…
26 अगस्त: भाजपा शासित राज्यों ने कहा- कोर्ट समय-सीमा नहीं तय कर सकतीं
26 अगस्त को पिछली सुनवाई में भाजपा शासित राज्यों ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा था। महाराष्ट्र, गोवा, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पुडुचेरी समेत भाजपा शासित राज्यों के वकीलों ने कहा कि बिलों पर मंजूरी देने का अधिकार कोर्ट का नहीं है।
इस पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई ने पूछा कि अगर कोई व्यक्ति 2020 से 2025 तक बिलों पर रोक लगाकर रखेगा, तो क्या कोर्ट को बेबस होकर बैठ जाना चाहिए? CJI ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट को ‘संविधान के संरक्षक’ के रूप में अपनी जिम्मेदारी त्याग देनी चाहिए?
महाराष्ट्र की ओर से सीनियर वकील हरीश साल्वे ने कहा कि बिलों पर मंजूरी देने का अधिकार सिर्फ राज्यपाल या राष्ट्रपति को है। संविधान में डीम्ड असेंट यानी बिना मंजूरी किए भी मान लिया जाए कि बिल पास हो गया जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज (उत्तर प्रदेश और ओडिशा की तरफ से) ने कहा कि राष्ट्रपति और गवर्नर को बिलों पर मंजूरी देने से पहले पूरी तरह स्वायत्तता और विवेक का अधिकार है। अदालतें कोई समय-सीमा नहीं तय कर सकतीं। पूरी खबर पढ़ें…

21 अगस्त: केंद्र बोला- राज्यों को बातचीत करके विवाद निपटाने चाहिए
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अगर राज्यपाल विधेयकों पर कोई फैसला नहीं लेते हैं तो राज्यों को कोर्ट की बजाय बातचीत से हल निकालना चाहिए। केंद्र ने कहा कि सभी समस्याओं का समाधान अदालतें नहीं हो सकतीं। लोकतंत्र में संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हमारे यहां दशकों से यही प्रथा रही है। पूरी खबर पढ़ें…
20 अगस्त: SC बोला- सरकार राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्वाचित सरकारें राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं। अगर कोई बिल राज्य की विधानसभा से पास होकर दूसरी बार राज्यपाल के पास आता है, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को यह अधिकार नहीं है कि वे अनिश्चितकाल तक मंजूरी रोककर रखें।
19 अगस्त: सरकार बोली- क्या कोर्ट संविधान दोबारा लिख सकती है
इस मामले पर पहले दिन की सुनवाई में केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 वाले फैसले पर कहा कि क्या अदालत संविधान को फिर से लिख सकती है? कोर्ट ने गवर्नर और राष्ट्रपति को आम प्रशासनिक अधिकारी की तरह देखा, जबकि वे संवैधानिक पद हैं। पूरी खबर पढ़ें…

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सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…
सुप्रीम कोर्ट बोला- पड़ोसियों के बीच में झगड़ा आम बात:उसे अपराध नहीं मान सकते; कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा- पड़ोसियों में झगड़ा होना आम बात है। अगर पड़ोसियों के बीच में झगड़ा, बहस और हाथापाई भी हो जाती है तो उसे आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC की धारा 306) के तहत अपराध नहीं माने जा सकते। जस्टिस बीवी नागरत्ना और के वी विश्वनाथन की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक महिला को पड़ोसी की आत्महत्या के लिए तीन साल की सजा सुनाई गई थी। कोर्ट ने कहा, धारा 306 में आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला तभी बनता है, जब यह साफ हो कि आरोपी ने जानबूझकर पीड़ित को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया हो। पढ़ें पूरी खबर…