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भुवनेश्वर23 मिनट पहले
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ओडिशा हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी की इनकम के सबूत नहीं हैं, तो यह मान लेना गलत है कि सभी पढ़ी-लिखी पत्नियां पति के पैसों पर जीना चाहती हैं। उन्हें काम न करने वाली महिलाएं यानी ‘बेकार वर्ग’ कहना भी गलत है।
कोर्ट ने माना कि पति ये साबित नहीं कर पाया कि पत्नी के पास परमानेंट इनकम है। उसने कोई दस्तावेज या सबूत नहीं दिया जिससे पता चले कि पत्नी कितने मामलों में वकालत कर रही है और कितना कमा रही है।
हो सकता है कोई व्यक्ति वकील के रूप में पंजीकृत हो लेकिन उसे लंबे समय तक केस न मिलें। ऐसे में ये मानना गलत है कि वह खुद का और बेटी का खर्च उठा सकती है।

इन सभी तर्कों और तथ्यों को देखते हुए, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। और कहा कि ‘अब पति को पत्नी और बेटी दोनों के लिए हर महीने 10,000 रुपए देने होंगे।’
दरअसल, एक व्यक्ति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे वकील पत्नी और बालिग बेटी को हर महीने 10,000 रुपए गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट की दो मुख्य टिप्पणी…
- सिर्फ शिक्षित होना यह साबित नहीं करता कि महिला जानबूझकर काम नहीं कर रही या पति पर बोझ बनकर रहना चाहती है। जब तक ठोस सबूत न हों तब तक ऐसी सोच रखना गलत है।
- जब पति की दूसरी शादी के आरोप पर कोई आपत्ति नहीं की गई तो पत्नी के अलग रहने का कानूनी आधार है। पति खुद तलाक की अर्जी दे चुका है इसलिए उसे पत्नी ने घर छोड़ दिया वाली दलील से कोई फायदा नहीं मिल सकता।
पति ने याचिका में कहा था कि उसकी पत्नी पढ़ी-लिखी है और उससे ज्यादा कमाती है। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी अपनी इच्छा से घर छोड़कर चली गई है, इसलिए वह मेंटनेंस की हकदार नहीं है।
वहीं इस मामले में पत्नी ने कहा कि वह वकील जरूर हैं, लेकिन उनकी कमाई बहुत कम है। साथ ही उन्हें लॉ पढ़ रही बेटी की पढ़ाई का और अन्य खर्च भी उठाना पड़ता है। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है।
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