राष्ट्रपति-राज्यपाल के लिए डेडलाइन मामला, सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई: केंद्र ने कहा था- अदालतों के लिए समयसीमा नहीं, तो गवर्नर के लिए क्यों?

राष्ट्रपति-राज्यपाल के लिए डेडलाइन मामला, सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई: केंद्र ने कहा था- अदालतों के लिए समयसीमा नहीं, तो गवर्नर के लिए क्यों?

राष्ट्रपति-राज्यपाल के लिए डेडलाइन मामला, सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई:  केंद्र ने कहा था- अदालतों के लिए समयसीमा नहीं, तो गवर्नर के लिए क्यों?


नई दिल्ली25 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को राज्य विधानसभाओं में पास बिलों पर विचार करते समय राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए डेडलाइन को लेकर राष्ट्रपति की तरफ से मांगे सुझाव पर सुनवाई होगी। राष्ट्रपति ने पूछा है कि क्या कोर्ट राज्यों के बिल से निपटने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय कर सकता है।

इससे पहले CJI बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने 19, 20 और 21 अगस्त को लगातार तीन दिन मामले की सुनवाई हुई थी। बेंच में CJI के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी एस नरसिम्हा और ए एस चंदुरकर शामिल हैं।

21 अगस्त को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में राज्यपालों के लिए समयसीमा तय करने का विरोध किया और कहा कि यह कोर्ट का नहीं, संसद का काम है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘जब अदालतों के लिए मामलों पर फैसला करने की कोई समय सीमा तय नहीं है, तो राज्यपालों के लिए ऐसा क्यों?’

केंद्र ने कहा कि अगर राज्यपाल विधेयकों पर कोई फैसला नहीं लेते हैं तो राज्यों को कोर्ट की बजाय बातचीत से हल निकालना चाहिए। सभी समस्याओं का समाधान अदालतें नहीं हो सकतीं। लोकतंत्र में संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हमारे यहां दशकों से यही प्रथा रही है।

पिछले हफ्ते लगातार तीन दिन सुनवाई हुई, पढ़िए इसमें क्या हुआ…

21 अगस्त: केंद्र बोला- राज्यों को बातचीत करके विवाद निपटाने चाहिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अगर राज्यपाल विधेयकों पर कोई फैसला नहीं लेते हैं तो राज्यों को कोर्ट की बजाय बातचीत से हल निकालना चाहिए। केंद्र ने कहा कि सभी समस्याओं का समाधान अदालतें नहीं हो सकतीं। लोकतंत्र में संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हमारे यहां दशकों से यही प्रथा रही है। पूरी खबर पढ़ें…

20 अगस्त: SC बोला- सरकार राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्वाचित सरकारें राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं। अगर कोई बिल राज्य की विधानसभा से पास होकर दूसरी बार राज्यपाल के पास आता है, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को यह अधिकार नहीं है कि वे अनिश्चितकाल तक मंजूरी रोककर रखें।

19 अगस्त: सरकार बोली- क्या कोर्ट संविधान दोबारा लिख सकती है इस मामले पर पहले दिन की सुनवाई में केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 वाले फैसले पर कहा कि क्या अदालत संविधान को फिर से लिख सकती है? कोर्ट ने गवर्नर और राष्ट्रपति को आम प्रशासनिक अधिकारी की तरह देखा, जबकि वे संवैधानिक पद हैं। पूरी खबर पढ़ें…

राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे थे 15 मई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों को लेकर 14 सवाल पूछे थे। राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से यह राय मांगी थी कि क्या कोर्ट राष्ट्रपति को राज्य विधानसभा से पास बिलों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा तय कर सकता है?

तमिलनाडु से शुरू हुआ था विवाद यह मामला तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच हुए विवाद से उठा था। जहां गवर्नर से राज्य सरकार के बिल रोककर रखे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को आदेश दिया कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है।

इसी फैसले में कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सामने आया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने मामले में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और 14 सवाल पूछे थे। पूरी खबर पढ़ें…

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