नई दिल्ली27 मिनट पहले
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असम के मुख्यमंत्री ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर CAA और विदेशी नागरिगों पर बयान दिया।
हिमंत बिस्व सरमा ने मंगलवार को कहा आम बंगाली हिंदू CAA के तहत नागरिकता के लिए आवेदन नहीं दे रहा है। असम में CAA की अभी कोई अहमियत नहीं है। असम के मुख्यमंत्री ने ये बयान मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया। उन्होंने कहा- हिंदू बंगालियों को विदेशी मानने की कोई वजह नहीं, क्योंकि वे 1971 से पहले आए थे। वो अपनी नागरिकता को लेकर आश्वस्त है।
उन्होंने कहा कि बंगाली हिंदुओं को 1971 में इंदिरा गांधी ने भारत में जगह दी थी। इन्हें वापस भेजने की कोई बात नहीं हुई थी। कांग्रेस ने घुसपैठियों को संरक्षण दिया।
असम में रह रहे घुसपैठियों पर उन्होंने कहा- कोई भी घुसपैठिया असम में नहीं छिप सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हमें सभी विदेशियों को बाहर भेजने के लिए कहा है।
नागरिकता के लिए असम में सिर्फ 12 आवेदन
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि अब तक असम में नागरिकता के सिर्फ 12 आवेदन आए हैं। अगर लाखों आवेदन आते तो भी हमें कोई दिक्कत नहीं होती। इमिग्रेशन और फॉरेनर्स (एक्सेम्प्शन) ऑर्डर, 2025 लागू होने के बाद कोई नया आवेदन नहीं आया।
इमिग्रेशन और फॉरेनर्स (एक्सेम्प्शन) ऑर्डर 2025 के तहत 31 दिसंबर 2024 तक भारत में आए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए अल्पसंख्यक (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई) बिना किसी पासपोर्ट के भारत में रह सकते हैं। पहले ये अवधि 31 दिसंबर 2014 तक थी। गृह मंत्रालय ने इसे 2024 तक बढ़ा दिया।
AASU और विपक्षी दलों का आरोप- केंद्र ने असम के साथ धोखा
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि केंद्र ने असम के साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा- असम अकॉर्ड में तय था कि मार्च 1971 तक आए लोगों को ही पहचानकर बाहर भेजा जाएगा। CAA ने यह तारीख बढ़ाकर 2014 कर दी। अब नए आदेश ने इसे और बढ़ाकर 2024 कर दिया है। भाजपा सरकार बाहर से आ रहे हिंदू बंगालियों को नागरिकता देनी चाहती है। CAA विरोधी आंदोलन में 5 लोगों की मृत्यु हो गई थी।
क्या है असम अकॉर्ड

असम अकॉर्ड 15 अगस्त 1985 को भारत सरकार और असम आंदोलन के नेताओं (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गण परिषद) के बीच हुआ। यह समझौता छह साल चले विदेशी-विरोधी आंदोलन को खत्म करने के लिए हुआ था, जिसमें हजारों लोगों की जान गई थी।
इस समझौते के अनुसार, 24 मार्च 1971 के बाद जो भी विदेशी अवैध रूप से असम में आए, उन्हें पहचान कर बाहर भेजा जाना था। यह तारीख उस समय असम में नागरिकता तय करने के लिए कानूनी कट-ऑफ मानी गई।
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