नई दिल्ली32 मिनट पहले
- कॉपी लिंक
चुनाव आयोग ने जल्द ही पूरे देश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) करने की बात कही है।
चुनाव आयोग (EC) ने बुधवार को बताया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) बिहार की तर्ज पर देशभर में होगा। लेकिन ज्यादातर राज्यों में आधे से ज्यादा मतदाताओं को किसी प्रकार का दस्तावेज दिखाने की जरूरत नहीं होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके नाम पिछली SIR की वोटर लिस्ट में शामिल हैं।
ज्यादातर जगह यह प्रक्रिया 2002 से 2004 के बीच हो गई थी। जिन लोगों के नाम उस समय की वोटर लिस्ट में थे, उन्हें अपनी जन्मतिथि या जन्मस्थान साबित करने के लिए कोई नया कागज नहीं देना होगा। जो नए वोटर बनना चाहते हैं, उन्हें डिक्लेरेशन फॉर्म भरना होगा। इसमें उन्हें यह बताना होगा कि वे भारत में कब जन्मे हैं। 1987 के बाद जन्मे लोगों को पैरेंट्स के दस्तावेज दिखाने होंगे

यह तस्वीर 17 अगस्त की है, जब बिहार में SIR को लेकर चुनाव आयोग ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।
इस पूरे मामले को उदाहरण से समझिए
बिहार में 2003 की SIR सूची को आधार बनाया गया है। वहां के लगभग 5 करोड़ मतदाता (60%) पहले से ही उस सूची में दर्ज हैं, इसलिए उन्हें कोई अतिरिक्त दस्तावेज नहीं देना पड़ा। वहीं लगभग 3 करोड़ नए मतदाताओं (40%) से 11 निर्धारित दस्तावेजों में से कोई एक मांगा गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसमें 12वां दस्तावेज आधार कार्ड भी माना गया।
दिल्ली की पिछली SIR सूची 2008 की है और उत्तराखंड की 2006 की, जो अब राज्य के CEO (मुख्य चुनाव अधिकारी) की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।
नई व्यवस्था में ऐसे लोग जो नए वोटर बनना चाहते हैं या दूसरे राज्य से शिफ्ट होकर आए हैं, उन्हें डिक्लेरेशन फॉर्म भरना होगा। इसमें उन्हें यह बताना होगा कि वे भारत में कब जन्मे हैं:
- 1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे हैं, तो खुद का जन्म प्रमाण देना होगा।
- 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे हैं, तो माता-पिता के जन्म या नागरिकता के दस्तावेज भी दिखाने होंगे।
- 2 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे लोगों के लिए शर्त और कड़ी है– उन्हें यह साबित करना होगा कि माता-पिता में कम-से-कम एक भारतीय नागरिक हैं और दूसरा गैर-कानूनी प्रवासी नहीं है। यानी उन्हें भी अपने पेरेंट के दस्तावेज दिखाने होंगे।

विपक्ष लगातार SIR पर सरकार और चुनाव आयोग का विरोध कर रहा है, अगस्त में संसद सत्र के दौरान भी विपक्ष के सांसदों ने विरोध किया था।
करीब दो लाख नए बीएलओ जोड़े जाएंगे
चुनाव आयोग सभी राज्यों में एक साथ SIR कराना चाहता है। हालांकि बिहार से मिले अनुभवों के आधार पर आयोग अपनी प्रक्रियाओं में भी कुछ सुधार करेगा। आयोग सूत्रों के मुताबिक,
करीब दो लाख नए बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) जोड़े जाएंगे। सुनिश्चित किया जाएगा कि 250 घरों पर कम से कम एक चुनाव प्रतिनिधि जरूर हो। हाल में हुई बैठक में राज्यों के निर्वाचन अधिकारियों से मिले इनपुट के आधार पर राष्ट्रव्यापी एसआईआर का रोडमैप तैयार किया जा रहा है।

इसमें मतदाता फॉर्म भरने, दावे और आपत्तियां दर्ज करने और दस्तावेजों की समीक्षा के बाद ड्राफ्ट और फाइनल मतदाता सूची जारी करने की टाइमलाइन भी बनाई जाएंगी। आयोग के सूत्रों ने कहा कि देशव्यापी SIR की कवायद का बिहार विधानसभा चुनाव से कोई संबंध नहीं है।
राज्यों को तैयारी शुरू करने के निर्देश मिल चुके
राज्यों के निर्वाचन अधिकारियों को तैयारी शुरू करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। तारीख घोषित होते ही पूरा अमला काम में जुट जाएगा। असम, मणिपुर मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, जम्मू-कश्मीर में गहन समीक्षा 2005 में हुई थी। बाकी राज्यों में 2002-03 में हुई थी। महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश में 2006-07 में और दिल्ली में 2008 में गहन समीक्षा हुई थी।
बिहार में 12 दस्तावेज मान्य, बाकी राज्यों में कम-ज्यादा हो सकते हैं

बिहार के एसआईआर में शुरुआत में 11 दस्तावेज मान्य किए गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आधार नंबर को 12वां दस्तावेज माना गया है। आयोग सूत्रों के अनुसार इन 12 दस्तावेजों के अलावा राज्यों की विशिष्टताओं के हिसाब से कुछ दस्तावेज घटाए या बढ़ाए जा सकते हैं। इसके लिए राज्यों से इनपुट लिए गए हैं।
सूत्रों का दावा है कि बिहार के SIR से सबक लेते हुए टाइमलाइन में भी विस्तार किया जा सकता है। जैसे, मतदाता फॉर्म भरने की अवधि 30 के बजाय 45 दिन तक की जा सकती है। साथ ही, ड्राफ्ट मतदाता सूची पर दावे और आपत्तियां लेने के लिए भी इतना ही समय दिया जा सकता है। दस्तावेजों की जांच के लिए एक महीना पर्याप्त रहेगा। ऐसे में, एसआईआर की यह पूरी प्रक्रिया चार से पांच महीने के भीतर पूरी की जा सकती है।
—————
ये खबर भी पढ़ें…
सुप्रीम कोर्ट बोला– आधार पहचान का प्रमाण, नागरिकता का नहीं: SIR पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में 8 सितंबर को बिहार में SIR (वोटर वेरिफिकेशन) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने कहा- आधार पहचान का प्रमाण पत्र है, नागरिकता का नहीं। कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया कि वोटर की पहचान के लिए आधार को 12वें दस्तावेज के तौर पर माना जाए। पूरी खबर पढ़ें…